Step-by-Step Sadhana of Mahavir Nirvana Kalyanak in Hindi

अब प्रभु महावीर निर्वाण कल्याणक की साधना आप अपने घर और दफ्तर में कर सकते हैं। तरीका एकदम सरल और सरस है। गुरुदेव प्रवीण ऋषिजी ने अष्टमंगल के प्रतीक चिन्हों से यह साधना हमें सिखाई है। आप इस वीडियो पर गुरुदेव के प्रेरणादायक शब्दों को सुन सकते हैं। समवसरण में प्रभु महावीर के तेजस्वी स्वरूप को देखते हुए आप अपने स्नेही जनों के साथ आत्मिक आनंद की अनुभूति कीजिए। परिवार के सभी जन मिलकर निर्वाण कल्याणक की साधना कीजिए।

आपको आवश्यकता होगी:
» 2-3 जोड़े स्वस्तिक-श्रीवत्स के प्रतीक चिन्ह
» पाटा तथा गद्दी
» समवसरण का चित्र
» घुला हुआ कुमकुम अथवा केसर
» खाली पुस्तक अथवा पेपर

साधना का क्रम

साधना प्रारम्भ करने से पूर्व समवसरण के चित्र को स्थापित करें। समवसरण के चित्र के सामने का स्थान पुस्तक रखने के लिए रिक्त ही रहने दें।
SAMVASARAN

साधना प्रारम्भ करने के लिए कहें:
प्रभु महावीर निर्वाण कल्याणक की हार्दिक मंगल कामनाएँ। आज हम महावीर निर्वाण कल्याणक की साधना करने जा रहे है।

1) पूंजनी को आवेशित करें

इसमें सर्वप्रथम हमें पूंजनी की आवश्यकता है। इससे हम भूमि का प्रमार्जन करेंगे। उससे पहले हम इस पूंजनी को लोगस्स के साथ आवेशित (charge) करेंगे।
[सभी समवेत स्वर में लोगस्स का पाठ करें]

2) भूमि का प्रतिलेखन

अब हम गद्दी की जगह को स्वस्तिक-श्रीवत्स की ऊर्जा से आवेशित करेंगे। इसे कहते है प्रतिलेखन। स्वस्तिक-श्रीवत्स के कार्ड के पाँच रंग में बहुत शक्ति है। यह पंच परमेष्टि के पांच रंग है। ये पंच महाभूत हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश। इनसे हमारे ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप और वीर्य में वृद्धि होती है।

स्वस्तिक श्रीवत्स के प्रतीक चिन्हों से भूमि का प्रतिलेखन करें:
»  सफ़ेद कार्ड के स्वस्तिक के मध्य बिंदु को 10-15 सेकण्ड तक देखें।
» अब सामने की भूमि को देखें।
» प्रक्रिया को सभी रंगों के प्रतीक चिन्हों के साथ दोहरायें। क्रम इस प्रकार है: सफ़ेद, लाल, पीला, हरा, नीला।

[सभी स्वस्तिक श्रीवत्स की साधना करें]

3) भूमि का प्रमार्जन

अब हम पूंजनी से भूमि का प्रमार्जन करेंगे। इससे यहां की ऊर्जा साफ़ हो जायेगी।
[जिस गद्दी के उपर आपको स्वस्तिक बनाना है, उसे बिछाने के पूर्व उस जगह को “अर्हम् भुएहिं जाण पडिलेह सायं अर्हम्” कहते कहते पूँज लेवे।]

4) नवकार मंत्र का जाप

अब हम मिलकर मंगलभावों के साथ नवकार मंत्र का जाप करेंगे।
[सभी नवकार मंत्र का जाप करें ]

5) तीर्थंकर को वंदना

अब ईशान कोण (north east) की तरफ खड़े हों। हम समवसरण का ध्यान करते हुए तीर्थंकर को वंदना करते है।
सभी मिलकर कहें: इच्छाकारेणं संदीसह भगवं। हे तीर्थंकर परमात्मा। इस साधना के लिए आपकी आज्ञा, मार्गदर्शन और आशीर्वाद चाहिए।

6) गुरु को वंदना

अब हम अपने-अपने गुरु को वंदना करते हैं।
सभी मिलकर कहें: इच्छाकारेणं संदीसह भगवं। हे गुरुदेव, इस साधना के लिए आपकी आज्ञा, मार्गदर्शन और आशीर्वाद चाहिए। हम पुण्यशाली और पुण्यसम्पदाशाली बनने के लिए यह साधना कर रहे हैं।

7) मंगलाचरण

अब हम सभी समवेत स्वर में मंगलाचरण करेंगे – (Refer Section 1 at end)

8) स्वस्तिक का अंकन

अब स्वस्तिक का अंकन कीजिए (Refer to Section 2 at end)
स्वस्तिक बनाने के बाद कहें: “भवतु स्वस्तिकं”
अब कहें: इच्छाकारेणं, संदिसह भगवं, सोहग्गं वद्धणाय आराहणयाए उवट्ठिओमी तव पसायए।
हुज्ज मे आराहणा, सिद्धिमयं तव पसायए तव पसायए।
आपकी कृपा से हमारी साधना सफल हो।

9) उत्तराध्ययन सूत्र का पाठ

अब समवसरण को देखें तथा श्री उत्तराध्ययन सूत्र के श्लोकों की स्तुति करें।
सभी मिलकर उत्तराध्ययन की सूक्तियों का पाठ करें। (Refer Section 3 at end)

10) स्वस्तिक की साधना

अब हम सभी कुमकुम वाले स्वस्तिक के मध्य में देखकर उसी दृष्टि को पारिवारिक जन को देखेंगे, फिर मकान को, बहीखाता, तिजोरी को देखेंगे।

11) नमोत्थुणं का पाठ

अब हम सभी समवेत स्वर में दो नमोत्थुणं का पाठ करके साधना को सम्पन्न करेंगे।
[नमोत्थुणं का पाठ]


SECTION 1: मंगलाचरण
मंगलम् भगवान वीरो, मंगलम् गौतमप्रभो। मंगलम् स्थूलिभद्राद्या, जैन धर्मोस्तु मंगलम्।।
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो। देवा वि तं नमंसंति, जस्स धम्मे सया मणो।। (दशवैकालिक सूत्र गा. १)
जयइ जगजीव-जोणी – वियाणओ, जग-गुरु जगाणंदो। जग-नाहो जग – बंधू, जयइ जगप्पियामहो भयवं।। (नंदीसूत्र गा.१)
जयइ सूयाणं पभवो, तित्थयराणं अपच्छिमो जयइ। जयइ गुरु लगाणं, जयइ महप्पा महावीरो।। (नंदीसूत्र गा.२)
मंगलपाठ।


SECTION 2: स्वस्तिक का अंकन करने की विधि
कुंकुम या केशर से १ से ८ क्रमांक के अनुसार गिद्दी या पेपर पर स्वस्तिक बनाइए।
draw swastik
स्वस्तिक का अंकन करते समय “नमो सिद्धाणं” का जाप करे तथा सांस को अंदर लेते हुए बनाएँ। सांस छोड़ते हुए स्वस्तिक न बनाए। स्वस्तिक मध्य में जोड़ने से बिना छेदवाला स्वस्तिक बनेगा।
अगर बीच में सांस रुक जाये तो स्वस्तिक को वहीं रोककर नमो सुपासनाहस्स बोलते हुए स्वस्तिक बनाना।
मध्य की चार बिंदी बनाते समय सांस को अंदर रोक ले तथा मन में नमो सिद्धाणं बोलते हुए तीर्थंकर के पंच कल्याणक का (भावना भाएँ) स्मरण करे।


SECTION 3: उत्तराध्ययन की सूक्तियाँ
(गुरुदेव के वीडियो से सुनें – 12.30 से 16.40)

मित्तवं नायवं होइ, उच्चागोए य वण्णवं। अप्पायंके महापन्ने, अभिजाए जसो बले।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. ३ गा. १८)

जहा संखम्मि पयं, निहियं दुहओ वि वीरायइ। एवं बहुस्सुए भिक्खु] धम्मो कित्ती तहा सुयं।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. ११ गा. १५)

जहा से चाउरंते, चक्कवट्टी माहिडिढए। चोद्दसरयणाहिवई, एवं हवइ बहुस्सुए।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. ११ गा. २२)

जहा से सामाइयाणं, कोट्ठागारे सुरक्खिए। नाणाधन्नपडिपुण्णे, एवं हवइ बहुस्सुए।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. ११ गा. २६)

जहा से नगाण पवरे, सुमहं मंदरे गिरी। नाणोसहिपज्जलिए, एवं हवइ बहुस्सुए।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. ११ गा. २९)

एगे जिए जिया पंच, पंच जिए जिया दस। दसहा उ जिणित्ताणं, सव्वसत्तु जिणामहं।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. २३ गा. ३६)

नमो ते संसयाईय! सव्वसुत्तमहोयही।। पसियंतु मे।
(उत्तराध्ययन अ. २३ गा. ८५)

अभिवंदित्ता सिरसा, गोयमं तु महायसं।। पसियंतु मे।
(उत्तराध्ययन अ. २३ गा. ८६)

नाणस्स सव्वस्स पगासणाए, अन्नाण-मोहस्स विवज्जणाए। रागस्स दोसस्स य संखएणं, एगंतसोक्खं समुवेई मोक्खं।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. ३२ गा. २)

आहारमिच्छे मियमेसणिज्जं, सहायमिच्छे निउणत्थबुद्धिं। निकेयमिच्छेज विवेगजोग्गं, समाहिकामे समण तवस्सी।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. ३२ गा. ४)

अच्चंतनियाणखमा, सच्चा मे भासिया वई। अतरिंसु तरंतेगे, तरिस्संति अणागया।।
हुज्ज मे तव पसायाए। (उत्तराध्ययन अ. १८ गा. ५३)

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